पुरातन अनुसंधान के कोरोनावायरस पर असर

पुरातन अनुसंधान के कोरोनावायरस पर असर:-* " alt="" aria-hidden="true" />
यह बात काफी पुरानी है, सन् १९२८ में जर्मन के बर्लिन विश्वविद्यालय ने शंख ध्वनि का अनुसन्धान करके सिद्ध किया कि प्रति सेकन्ड २६ घन फुट वायु शक्ति के जोर से बजते हुए शंख से निकलने वाली ध्वनि तरंगें १२००फीट दूरी तक की परिधि में आने वाले बैक्टीरिया को नष्ट कर देती है तथा २६०० फीट दूरी तक के बैक्टीरिया अक्रियाशील हो जाते हैं। बैक्टीरिया के अतिरिक्त इससे हैजा, गर्दन तोड़ बुखार तथा कमर ज्वर के विषाणु भी नष्ट होते हैं| जिस स्थान पर शंख बजता है, वह स्थान बैक्टीरिया रहित हो जाता है  अमेरिका के शिकागो के डॉ० ब्राइन ने भी इस तरह के अनेक परी़क्षण किए हैं।
 - रूस के मास्को सैनीटोरियम में घंटा ध्वनि का तपेदिक रोग के उपचार में सफल प्रयोग किया गया है| वैज्ञानिक प्रयोगों से सिद्ध हुआ है कि घंटे की ध्वनि से वातावरण में उपस्थित बहुत से हानिकारक बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं तथा वातावरण  शुद्ध हो जाता है।
प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने जब देश वासियों से ये  कहा कि वो 22 मार्च जनता कर्फ्यू के दिन अपने-अपने घरों में से ही ताली बजाकर, थाली बजाकर, घंटी बजाकर,शंख बजाकर एक-दूसरे का आभार जताएं और इस कोरोना वायरस से लड़ने के लिए एकजुटता दिखाएं तब से  मोदी जी की इस अपील के बाद सोशल मीडिया पर 'थाली-ताली' बजाने को लेकर कईं मूढमति राष्ट्रघाती लोग इसकी घोर आलोचना कर रहे है 
 तो वहीँ दूसरी तरफ इसका धार्मिक वैज्ञानिक महत्व जानने वाले सुलझे हुए लोग इस सुझाव की  खुल कर तारीफ भी कर रहे है।


भारतीय सनातन धर्म और आयुर्वेद की माने तो वातावरण(environment) में ध्वनी पैदा करना न सिर्फ व्यक्ति के आसपास के वातावरण को बल्कि व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक शक्ति को मजबूत बनाता है। ये ध्वनी शंख बजा कर, थाली बजाकर या घंटी बजा कर पैदा की जा सकती है। आयुर्वेद की माने तो घंटियां इस तरह से बनाई जाती हैं कि जब वे ध्वनि पैदा करती हैं तो वो व्यक्ति के दिमाग के बाएं और दाएं हिस्से में एकाग्रता पैदा करती हैं। जो मानव शरीर के सभी सात उपचार केंद्रों को सक्रिय कर देता है।
मंदिर की घंटियां कैडमियम, जिंक, निकेल, क्रोमियम और मैग्नीशियम से बनती हैं इसकी आवाज़ मस्तिष्क के दाएं और बाएं हिस्से को संतुलित करती है। जैसे ही आप घंटी या घंटा बजाते हैं उससे एक तेज़ आवाज़ पैदा होती है, ये आवाज़ 10 सेकेंड तक गूंजती है।
 इस गूंज की अवधि शरीर के सभी 7 हीलिंग सेंटर को एक्टीवेट करने के लिए काफी अच्छी होती है। इससे एकाग्रता बढ़ती है मन भी शांत रहता है। घंटी की ध्वनि मन, मस्तिष्क और शरीर को ऊर्जा और शक्ति प्रदान करती है और मनुष्य सकारात्मक ऊर्जा से घिरा रहता है चूँकि इस तरह के प्रकोप के दौरान व्यक्ति भयाक्रांत रहता है और उसका मनोबल टूट चुका होता है अतः इस समय मुख्य आवश्यकता इस बात की होती है की उसकी आंतरिक शक्ति को किसी भी तरह जाग्रत रखा जाए और चूँकि  ये ध्वनि तरंगे व्यक्ति के मस्तिष्क में सकारात्मकता पैदा करने वाले हार्मोन्स का स्त्राव आरम्भ कर देती है फलस्वरूप पीड़ित व्यक्ति में आत्म विश्वास लौटने लगता है।
जब भी घंटियां बजाई जाती है तब वातावरण में कंपन पैदा होता है, जो काफी दूर तक जाता है। इस कंपन के कारण ही इसके क्षेत्र में आने वाले सभी जीवाणु, विषाणु और सूक्ष्म जीव आदि नष्ट हो जाते हैं, जिससे आसपास का वातावरण शुद्ध हो जाता है। इसी तरह शंख, घंटी, थाली और चम्मच बजाने से निकलने वाली ध्वनि एक निश्चित आवृत्ति में तेज कंपन ध्वनी पैदा करती हैं, जो कई व्यक्तियों के शारीरिक रूप से अलग-अलग होने बाद भी एक बराबर हो जाती है। यही ऊर्जा शरीर में किसी भी रोग और विषाणुओं से लड़ने की क्षमता पैदा करती है।
ध्यान रखें बजाते समय घंटी को वामभाग में रखना चाहिए और बाएं हाथ से नेत्रों तक ऊंचा उठाकर बजाना चाहिए।
विज्ञान हमेशा से ठोस तथ्य की तलाश में रहा है। ध्वनी पैदा करने की इस पद्धति में भी विज्ञान ने शोध कार्य और परीक्षणों का सहारा लिया। नासा के माने तो ध्वनी पैदा करने से खगोलीय ऊर्जा (Celestial Energy) का उत्सर्जन(Excretion) होता है, जो जीवाणु का नाश कर लोगों में ऊर्जा व शक्ति का संचार करता है। इसमें शंख बजाने को खासा महत्व दिया गया है क्योंकि शंख बजाने से आतंरिक और बाहरी दोनों वातावरण प्रभावित होते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि शंख की आवाज से वातावरण में मौजूद कई तरह के जीवाणुओं-कीटाणुओं का नाश हो जाता है। कई टेस्ट से इस तरह के नतीजे सामने आए हैं।
इतना ही नहीं, वैज्ञानिकों का मानना है कि शंख के प्रभाव से सूर्य की हानिकारक किरणें बाधित होती हैं। शंख-ध्वनि से वातावरण साफ होता है। 
वैज्ञानिकों का मानना है कि शंख की आवाज से वातावरण में मौजूद कई तरह के जीवाणुओं-कीटाणुओं का नाश हो जाता है शंख की आवाज जहां तक जाती हैं वहां तक सारा क्षेत्र विसंक्रमित (disinfected) हो जाता है।
और दुनियाँ भर में विभिन्न प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में इन पर हुए कई टेस्ट से इस तरह के नतीजे भी मिले हैं।
साथ ही शंख बजाने से फेफड़े का व्यायाम होता है। पुराणों में जिक्र मिलता है कि अगर श्वास का रोगी नियमित तौर पर शंख बजाए, तो वह बीमारी से मुक्त हो सकता है। चूँकि कोरोना फेफड़ो से जुडी बिमारी है अतः यदि फेफड़े मजबूत होंगे तो कोरोना वायरस आसानी से संक्रमण नही फैला पायेगा।
वस्तुतः हिन्दू धर्म में ऋषि मुनियों और मनीषियों ने मानव कल्याण के लिए और आपदाओं से  उनके बचाव के लिए नित्योपयोगी परम्पराओं के रूप में एक ऐसा अभेद्य सुरक्षा चक्र निर्मित कर दिया था जो  इन परम्पराओं को अंगीकार करने वालो को तो सुरक्षित रखता ही है साथ ही उन परम्पराओं का अनुपालन ना करने वाले उनके आसपास रहने वालो को भी अपना सुरक्षा कवच प्रदान करता है , यह दुःखद ही रहा की सनातन परम्पराओं को रूढ़ि और ढकोसला सिद्ध करने की आड़ में योजनाबद्ध ढंग से इस बिना खर्चे की इस उपचार पद्धतियों के साथ ही एक सम्रद्ध संस्कृति को नष्ट करने का घातक षडयंत्र आज तक चलाया जा रहा है अच्छा होगा हम समय रहते चैतन्य हो । आज आवश्यकता इस बात की है की हम अपनी गौरवमयी पूर्णतः वैज्ञानिक जीवन शैली को गर्व के साथ पुनः अपनाये और स्वयं तथा सारे परिवार, समाज और राष्ट्र को भी पुनः सुरक्षित करने का प्रयास करें।
हमने पहले भी अनेक भीषण आपदाओं का सफलता पूर्वक सामना किया है और कोरोना रूपी इस विपदा को भी परास्त कर देंगे बशर्ते सभी अपनी अपनी जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से निभाने का प्रयास करें।


कोरोना से बिलकुल डरे ना
सिर्फ सावधानी रखें ......
*✍ कौशलेंद्र वर्मा।*